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Vol.10, Issue.2, 15 Jul, 2019

ISSN  2249 – 9180 (Online)

Bilingual (Hindi & English)
Half Yearly

Print & Online

Dedicated to interdisciplinary Research of Humanities & Social Science

An Open Access INTERNATIONALLY INDEXED PEER REVIEWED REFEREED RESEARCH JOURNAL and a complete Periodical dedicated to Humanities & Social Science Research.

मानविकी एवं समाज विज्ञान के मौलिक एवं अंतरानुशासनात्मक शोध पर  केन्द्रित (हिंदी और अंग्रेजी)

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In the initial stages there was no compartmentalisation between Science and other kind of knowledge but as more as discoveries and inventions were made, the spirit of specialisation evolved and scientific discoveries were classified under one or other of basic Sciences viz. Physics, Chemistry, Biology, Astronomy and Genetics etc. In due course the progress and proliferation made in Science became so vast and fast that all almost 90 percent of everything we know in the Science has been generated in the last fifty years. The scientific discoveries and technological inventions have accelerated the process of social change reducing the World to a global village. Through this research paper the researcher wants to focus light on ways for practicing and inculcation of values through examples quoted from Science. The researcher wishes to establish a futuristic society of such an individuals fulfilled with all the five values: Satya, Dharma, Shanti, Prema and Ahimsa in their nature. It will essentially provide them real sat- chit- ananda, a real bliss as an implication of this research paper.

An attempt is made to analyse the performance and impact of Gramin Bank of Aryavart in Lucknow district through various parameters collected from bank officials such as number of employees, number of accounts, advances and deposits mobilization and from customers such as sources of information, staff co-operation, decadal difference and suggestions provided by account holders/customers. For the analysis of the qualitative research excel functions of sum, count and proportion has been used. As the collected raw data was in sentence and paragraph form the data was edited, coded, themed and analysed. The study has analysed that even though the woring of GBA has considerably declined, the progress, performance and impact of GBA has significantly improved over time with scope of improvement. The study has reported that there is significant improvement in working of GBA in urban and rural areas and it is also noticable that facilities provide by GBA has increased over a decade.

समाज में सोशल मीडिया का प्रचलन लगातार बढ़ता जा रहा है। इसलिए विविध कम्पनियॉं भी अपने लाभ के लिए इसका अधिकाधिक उपयोग करने लगी हुई हैं। स्मार्टफोन पर सोशल मीडिया की आसानी से उपलब्धता हो जाने के कारण वर्तमान में इसके उपभोक्ताओं की संख्या में बहुत अधिक बढ़ोत्तरी हुई है। अब यह रेडियो, टीवी एवं प्रिंट माध्यम का न केवल एक बहुत ही जबरदस्त विकल्प बन गया है वरन् ये सभी माध्यम अब स्मार्ट फोन पर भी उपलब्ध होने लगे हैं। सोशल मीडिया की वर्तमान स्थिति को देखते हुए इसके उपयोग के तौर-तरीके के बारे में जानकारी पाने के लिए अध्ययन किये जाने का महत्त्व भी बहुत बढ़ गया है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए सोशल मीडिया के प्रभाव एवं आदत के सन्दर्भ में प्रस्तुत शोध कार्य को सम्पन्न किया गया है। इस अध्ययन से ज्ञात होता है कि सोशल मीडिया का युवाओं में काफी अधिक इस्तेमाल किया जाने लगा है। स्मार्टफोन पर सोशल मीडिया की उपलब्धता ने इसे काफी प्रचारित कर दिया है। इस माध्यम का लोगों के सामाजिक जीवन, दिनचर्या, स्वास्थ्य आदि पर भी काफी प्रभाव पड़ा है।

The food processing sector has a prominence next to no other business in the country. Initially starting a bakery business does not involve higher investment, thus making it well-paid for people who are thinking of initiating something of their own, especially the homemakers. Women constitute the backbone of any nation and prosperity of the nation depends upon the prosperity of its women. A well-developed food bakery is expected to ensure value addition, and generate employment opportunities. The current Indian bakery market is small, there is substantial potential for growth and diversification in the immediate future. The growth of bakery industry in India is led by two trends: convenience foods, and the growing demand of nutritious, healthy and tasty bakery products. Thus, the bakery industry has unquestionable potential and impact in terms of job creation and household business opportunities, together with providing a wide range of bakery products with good nutrition value at relatively cheaper prices.

8 नवम्बर, 2016 को 500 व 1000 रु के नोटों के विमुद्रीकरण से भारत मे नकदी रहित अर्थव्यवस्था की शुरूआत की गई। इसके साथ-साथ नई तकनीक व सुविधाओं के द्वारा नकदी रहित अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए सरकार के द्वारा विभिन्न प्रयास किये जा रहे हैं। इस शोधपत्र मे 8 नवम्बर 2016 से 28 फरवरी 2018 को एक वित्तीय वर्ष में आर.टी.जी.एस, एन.ई.एफ.टीपी.ओ.एस, सी.टी.एस, यू.पी.आई्, यू.एस.एस.डी, क्रेडिट व डेबिट कार्ड और मोबाइल बैंकिग द्वारा किए गए नकद रहित लेनदेन के मूल्य व मात्रा में हुए परिवर्तन का अध्ययन किया गया है।

पर्यटन तृतीयक क्रियाकलाप है जिसमें पर्यटकों की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए वस्तुएँ और सेवाएँ प्रस्तुत की जाती हैं। यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें घूमने-फिरने, चिन्तन-मनन के साथ अन्य तत्त्व जैसेः परिवहन के साधन, आवासीय सुविधाएँ और खान-पान आदि भी स्वतः ही जुड़ जाते हैं। अतः पर्यटन एक ऐसा व्यवसाय है जिसमें दूसरे उद्योगों के उत्पादों के मध्य प्रतिस्पस्पर्धा न होकर उत्पादों एवं वस्तुओं के बीच सौहार्द्र, समन्यवय तथा सम्मान की भावना निहित होती है। पर्यटन अवसंरचना उद्योगों, फुटकर व्यापार तथा शिल्प उद्योगों को पोषित करता है। बरकार्ट के अनुसार, पर्यटन उद्योग विभिन्न प्रकार के व्यापारों और संगठनों का समुच्य है तथा इसमें अर्थव्यवस्था के वस्तुतः सभी क्षेत्र शामिल हैं। पर्यटन उद्योग अन्य उद्योगों से भिन्न है। इसका उत्पाद वस्तु-निर्माण उद्योग जैसा नहीं होता है। इसके विपणन की प्रक्रिया भी अलग होती है। पर्यटन विपणन में अमूर्त विचारों का क्रय-विक्रय होता है। अन्य उद्योगों की भाँति पर्यटन में भी मांग की उत्पत्ति होती है। यह विभिन्न उद्योगों हेतु बाजार उपलब्ध् कराता है। यह एकाकी उद्योग न होकर बल्कि एक समन्वित उद्योग है क्योंकि इसमें विभिन्न क्रियाएँ और सेवाएँ जुड़ी होती हैं इसलिए इसे मिला-जुला उद्योग कहते हैं।

हिन्दी फिल्मों का इतिहास 100 वर्षों से भी पुराना हो चला है। यदि बोलती फिल्मों की बात ही की जाये तो भी 1931 में पहली फिल्म आयी थी। तब से अब तक हिन्दी फिल्में लगातार समाज के हर वर्ग का मनोरंजन कर रही हैं। पर ये फिल्में न केवल मनोरंजन का साधन हैं वरन ये समाज पर अपना प्रभाव भी डाल रही हैं। आजादी से पहले कुछ फिल्में आजादी को ही ध्यान में रखकर बनायी गयीं, फिर आजादी के बाद शम्मी कपूर आदि को लेकर मनोरंजनात्मक फिल्में ही बनीं। हांलाकि मनोज कुमार, जिन्हें भारत कुमार भी कहा जाता है, ने देश-प्रेम से ओत-प्रोत फिल्में, जैसे- पूरब-पश्चिम, उपकार बनाईं। फिर दौर आया कलात्मक फिल्मों का, जब स्मिता पाटिल, शाबाना आशमी,ओमपुरी व नसीरूद्दीन शाह जैसे कलाकारों को लेकर मिर्च-मसाला, अर्धसत्य जैसी फिल्मों का निर्माण हुआ। इन सभी तरह की फिल्मों ने समाज पर अपनी छाप छोड़ी। इस प्रकार कहा जा सकता है कि समाज पर समय-समय पर हर तरह की हिन्दी फिल्मों का प्रभाव देखा गया हैं। हिन्दी फिल्मों में फैशन पर, नारी केंद्रित भूमिकाओं पर काफी कुछ लिखा जा चुका है, परन्तु इन फिल्मों में पुस्तकालयों का प्रस्तुतीकरण अधिकतर प्रेमालाप के लिए ही किया गया है। हांलाकि कुछ फिल्मों में इन्हें प्रेमालाप से इतर अन्य भी किया गया है। इस लेख में हिन्दी फिल्मों में पुस्तकालयों का प्रस्तुतीकरण किस प्रकार किया है, इसका विश्लेषण किया गया है।

Education is crucial to the growth and evolution of a society. It is fundamental in establishing an equitable society. It imparts in the children the skills, knowledge and an understanding that makes a responsible and law abiding citizen. With the ‘Right to education' enshrined in our Constitution as a fundamental right, free and compulsory universal education has been laid emphasis on with major goals of elementary education amongst others, on one hand, and on the other we encounter a failing education system. More focus on quantity (like universal retention of children up to 14 years of age) has apparently been achieved, but at the same time the dilution of the quality of education has been surfaced. There is a serious deficit of the people at all the levels that ought to be dedicated towards thriving in maintaining a reputable standard of education. From quality of teachers appointed, to the administration of an educational set up, to the visionary bureaucrats and the politicians, and the policy-makers, a level of dedication and devotion is required.

आरम्भ से ही जैसे-जैसे मानव समाज का भौगोलिक और परिवेशगत विस्तार होता गया उसके परिवेश और संस्कृतियों में विविधता आती गयी। संस्कृति का भाषा पर पूरा अधिकार होता है। अतः अलग-अलग संस्कृतियाँ शुरू से ही विविध रूपात्मक रहीं। इससे यह स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है कि किसी भी समाज की संस्कृति भाषा और उसके विचारों का एक अनिवार्य त्रिभुज बनता है जिसके भीतर उस समाज के जीवन का चित्र और चरित्र अवस्थित रहता है। यदि इस त्रिभुज की कोई एक भी भुजा बदल दी जाये अर्थात् भाषा, संस्कृति और विचार में से कोई एक भी चीज अन्य समाज की हो तो असंगत पैदा हो जायेगी और इस असंगत का असर तीनों पर पड़ते हुए जीवन पर पड़ेगा। इतिहास गवाह है कि व्यापारिक और राजनैतिक कारणों से यह असंगत पड़ती रही है जिसके परिणामस्वरूप भाषायी और सांस्कृतिक संक्रमण की स्थितियाँ उत्पन्न होने के कारण भाषा और संस्कृति के स्वरूप में परिवर्तन भी देखे गये हैं। इस संक्रमण से समाज की संस्कृतियों का आदान-प्रदान भी हुआ, जिसके कारण भाषा की अभिव्यक्ति क्षमता बढ़ी भी है। लिखने बोलने में सार्थक और स्पष्ट वाक्य विन्यास तक पहुँचने में मानव को लम्बा समय लगा और इस लम्बे समय में उसके सोचने के तौर-तरीके ने ही उसे जातीय पहचान भी दी।

भारत में सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था परस्पर घनिष्ठ रूप से सम्बन्धित रही हैं। भारतीय ग्राम्य सामाजिक संरचना के आधार थे। भारतीय अर्थव्यस्था कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था थी। ग्रामीण अर्थव्यवस्था स्वयं-पूर्ति अर्थव्यवस्था के साथ अतिरेक सृजक अर्थव्यवस्था भी थी, परन्तु उदारीकरण, निजीकरण एवं विश्वव्यापीकरण के पश्चात् भारतीय सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था में अधिकाधिक परिवर्तन दृष्टिगोचर हो रहे हैं। इन सभी परिवर्तनों के प्रभाव ने भारतीय सामाजिक-आर्थिक संरचना की जबरदस्त कायापलट की है। जिसके कारण अतिरेक सृजक अर्थव्यवस्था बाजारोन्मुखी अर्थव्यवस्था की ओर प्रवृत्त हुई है। पाश्चात्य संस्कृति के हावीपन ने एक अच्छे भले सामाजिक प्राणी को मात्र आर्थिक प्राणी बनाकर छोड दिया है जिससे भारतीय सामाजिक-आर्थिक विशेषताओं सम्बन्धी धरोहर समाप्त हो गयी है। अतः वर्तमान समय में देश की आवश्यकतानुसार मूल विशेषताओं का पुनर्जागरण किया जाना अति आवश्यक है जिससे भारत की विश्व में अपनी पहचान बन सकेगी।

साहित्य समाज का दर्पण होता है। यह उक्ति भले ही कितनी ही पुरानी क्यों न हो इसमें निहित अर्थ आज भी जीवंत है। समाज में घटने वाली प्रत्येक घटना को साहित्य में किसी न किसी रूप में स्थान अवश्य मिलता है। भूमंडलीकरण की परिघटना भी एक ऐसी परिघटना है जिसने भारतीय इतिहास में एक अमिट छाप छोड़ी है। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् बिगड़ती अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की दृष्टि से भूमंडलीकरण की नीति को यह सोचकर अपनाया गया था कि यह पूरे देश में एक ऐसी संस्कृति विकसित करेगी जो मनुष्य मात्र के कल्याण के लिए प्रतिबद्ध होगी किंतु हुआ इसके ठीक विपरीत। भूमंडलीकरण एक ऐसी अवधरणा के रूप में समाज के समक्ष प्रकट हुआ जिसके मूल में बाजार, उपभोग, पूंजीवाद की संस्कृति का ही बोलबाला है। इसने मनुष्य से उसके मनुष्य होने का गुण छीन लिया है और उसे एक ऐसी अंधी गुफा में धकेल दिया है जिसमें प्रकाश की धीमी लौ भी मिलना अत्यंत मुश्किल है। इसने भारतीय समाज को इस हद तक परिवर्तित कर दिया है कि उसकी परंपराएँ, आदर्श, जीवन मूल्य, नैतिकता आदि का पतन होने लगा है। हिंदी उपन्यास भी इससे अछूता नहीं रहा है उपन्यासकारों ने इन्हीं पतन होते हुए मूल्यों पर अपनी दृष्टि डाली और अपने उपन्यासों में इसके प्रभाव को बड़ी बारीकी से प्रस्तुत किया है।

भारतीय संस्कृति प्राचीन काल से ही अमूल्य-अथाह निधि अपने गर्भ में संचित किए हुए है। सम्पूर्ण विश्व को इसने शरणागत का अभय दान दिया है। प्रतिदान की आकांक्षा किसी से नहीं की। पौराणिक काल से यह तपोभूमि स्वयं की आहुति दे कर किंचित वर्ग को सुख-समृद्ध बनाने का प्रयास करते हुए अथाह खजाने लुटाती रही है। सदियों से आततायियों ने इस भूमि को कभी माँ के रुप में त्याग-बलिदान की मूर्ति मानकर, तो कभी प्रेमिका बनाकर रौंदने व लूटने का कार्य किया। तदन्तर काल से विभिन्न संस्कृतियों के आवागमन होने पर भी हमारे शाश्वत मूल्य कभी खंडित नहीं हुए बल्कि सांस्कृतिक संगम के अच्छे-बुरे अनुभव से हम सद्भावों को ग्रहण करते रहे और दुर्भावना का त्याग करते रहे। इस धरा पर सत्य-असत्य, न्याय-अन्याय के युद्ध सदैव होते रहे लेकिन जीत सत्य व न्याय की ही हुई है। ये मूल्य विगत काल में भी शाश्वत थे व आज भी जीवंत हैं। विश्वभर ने यहाँ ज्ञानार्जन कर नैतिक मूल्यों को ग्रहण किया है। संतों ने मूल्य-दर्शन को पुनः स्थापित करने का बीड़ा उठाया। कबीर, तुलसी, नानक व दादू दयाल सहित संतों की दीर्घ परम्परा ने अपने उपदेशों के माध्यम से मानव मूल्यों को सर्वोपरि बताकर लोकहित का प्रखर शंखनाद किया। दादूपंथ परम्परा में पुश्कर के संत नारायण दास ने आधुनिक काल में अपने उपदेशों के माध्यम से सार्वभौमिक मूल्यों का प्रचार-प्रसार किया। अपने साहित्य सृजन से प्राणिमात्र के कल्याण हेतु मानव मूल्यों को जीवंत बनाकर प्रस्तुत किया। पुष्कर, अजमेर जैसे साम्प्रदायिक सद्भावना स्थल पर सभी धर्मों व सम्प्रदाय के लोगों के प्रति आत्मियता रखते हुए प्रेम व सौहार्द्र का संदेश दिया।

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5. भारतीय विश्वविद्यालयों में मानविकी एवं सामाजिक विज्ञानं के अधिकांश शोध हैं –
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