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Vol.9, Issue 1

Vol.9, Issue 1

SHODH SANCHAYAN

 

Vol. 9, Issue. 1, 15 Jan, 2018

ISSN  2249 – 9180 (Online)

Bilingual (Hindi & English)
Half Yearly

Print & Online

Dedicated to interdisciplinary Research of Humanities & Social Science

An Open Access INTERNATIONALLY INDEXED REFEREED RESEARCH JOURNAL and a complete Periodical dedicated to Humanities & Social Science Research.

मानविकी एवं समाज विज्ञान के मौलिक एवं अंतरानुशासनात्मक शोध पर  केन्द्रित (हिंदी और अंग्रेजी)

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Index/अनुक्रम

 

How sensory data form cognition has been subject to extensive discussion from the past. The etymological meanings of the terms that denote ‘to see/ look at’ and ‘to perceive’ have been corresponding and complementary in most of the Indo-European languages including Sanskrit. Although some such terms were semantically restricted over time some others retained the breadth of meaning their Proto Indo-European roots had carried. The somatic activity of seeing/ looking at something and the cognitive activity of perceiving it share a series of terms where those denotative of ‘visual perception’ seem to be re-dominant. This paper concisely compares selected Proto Indo-European roots and their derivatives in Indo-Germanic, Indo-Iranian and Indo-Aryan languages to recognize some interesting matches and mismatches in terms of phonetic composition and meaning. It also argues that in the context of Indian philosophy the terms that denote to see and to perceive are more strikingly corresponding than they do in other environments.

मनुष्य के जीवन में धर्मयुद्ध निरंतर चलता रहता है। मोहासक्त मनुष्य सदा ही अपने कर्म से च्युत होकर वह करता है जो न केवल उसके लिए वरन समाज के लिए अहितकर है। सभी प्रकार की शिक्षा प्राप्त कर व्यक्ति अपने विषयों मे प्रवीण होकर भी अपने ज्ञान का समुचित प्रयोग नहीं कर पाता। शिक्षा समाज की संपत्ति है, समाज शिक्षा पर अपना अंशदान करता है, किन्तु वर्तमान शिक्षाप्राप्त व्यक्ति उसका प्रयोग मोह के वशीभूत होकर  नितांत व्यक्तिगत हितों के लिए करता है। फलत: समाज उस शिक्षा के लाभ से वंचित हो जाता है। प्रस्तुत शोध आलेख कृष्ण और अर्जुन के माध्यम से श्रीमदभगवद्गीता की शिक्षा का विश्लेषण प्रस्तुत करता है।

Prometheus Unbound is a four act verse play by P B Shelley first published in 1820. It has its inspiration from the classical trilogy Prometheia by Aeschylus. In both the plays, Prometheus challenges Jupitor and gives fire to the humans for which he is tormented at the hands of Jupitor. The core theme of both the plays is similar, however in the hands of Shelley, the story takes another treatment. While in Aeschylus, Jupitor and Prometheus reconcile, Shelley gives Prometheus a moral uplift by making him stand vis-à-vis an oppressor. Shelleyan Prometheus differs from Aeschylus’ Prometheus in many ways. He endures sufferings and keeps patiencefor the sake of the welfare of humanity. Shelley’s Jupitor is defeated by his own evils.

यथार्थ और कल्पना का द्वन्द सर्वत्र मनोजगत में घटित होता है। साहित्य इससे अछूता नहीं है, लेकिन साहित्य कल्पना के सहारे जटिल यथार्थ को उद्घटित करता है और बालसाहित्य जो बाल मन के कोरे स्नेह पर सीधे-सीधे खींचे हुए ताने-बाने को कल्पना के प्रयोग से रंग और चित्राकृतियाँ उभारता है। इसलिए बाल कहानियों में यथार्थ और कल्पना का उचित सामंजस्य आवश्यक है। प्रस्तुत शोधपत्र का उद्देश्य, नीलम राकेश की बालकहानियों में निहित यथार्थ और कल्पना को उजागर करके, बाल व्यक्तित्‍व-विकास में बालकहानियों के योगदान को प्रतिपादित करना है।

संस्कृत साहित्य को समृद्ध करते हुए कौटिल्य ने ‘अर्थशास्त्र’ में राजनीतिक सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया है। राज्य के ‘साव्यव’ स्वरूप का प्रतिपादन करते हुए कौटिल्य ने इसके सात अंग बताये हैं- स्वामी (राजा), अमात्य, जनपद, दुर्ग, कोश दण्ड तथा मित्र। इनका सामूहिक वर्णन ‘सप्तांग सिद्धांत के नाम से जाना जाता है। इन अंगों के उचित समन्वय तथा सामन्जस्यपूर्ण व्यवहार से ही राजलक्ष्यों को प्राप्त किया जा सकता है जिसके लिए कौटिल्य स्वामी (राजा) की भूमिका को सर्वोपरि मानते हैं।

Often referred as the ‘UpanyasSamrat', Premchand courts huge popularity among Hindi and Urdu readers. He left behind a massive corpus of work which stretched over three vital decades of Indian history: a period when countrymen were vigorously fighting against the foreign rule. Nothing short of revolutionary in those times, Premchand fostered the independence movement through his realistic literary works which were based on the actual situations and conditions of the Indian society of that time. For him, writing was a mission and in the course of his literary career he passionately clung to the belief that no writer in a subject country could afford the luxury of writing without a social purpose.

स्वतंत्रता के इकहत्तर वर्षों के बाद भी आदिवासी क्षेत्रों में विकास का स्तर नगण्य है। अत्याधुनिक तकनीक एवं संसाधनों के विकास तथा सरकारी स्तर पर प्रारम्भ की गई योजनाओं का लाभ बहुत थोड़े स्तर पर ही मिला है। अशिक्षा गरीबी, एवं जागरुकता के न अभाव में लोग विकास से अछूते हैं। ऐसे परिवेश में मीडिया ही एकमात्र साधन है जो लोगों में जनजागरूकता का संचार कर इस क्षेत्र का चहुँदिश विकास कर सकती है।

Today, in the fast-paced world, the countries are put in the race of developing their economic status at a rapid rate. There are various factors that the countries have realized, are the game-changers in this race. One of these important factors is gender equality. Not only in under-developed countries, but also developed countries have looked down upon the gender equality. But, lately, the countries are working towards the upliftment and empowerment of women, since they have realized that every citizen of their country is an asset to the country. With this upliftment, the “male-dominated” society has paved way for bringing gender equality. Whenever the women grab any opportunity, they have come up with flying colours and has shown results better than the menThis study aims to understand how the gender inequality underwent change to gender equality, contributing to the economic status of the country and further leading to a civilized world. This paper will be an asset to corporates, economists, activists, and academicians who want to understand how the gender equality evolved and how it can be enhanced further to gear up the economy.

माध्यमिक स्तर पर भारत में कई परीक्षा बोर्ड हैं। अध्ययन हेतु बोर्ड का चुनाव छात्र व अभिभावकों के लिए चुनौतीपूर्ण कार्य है। प्रस्तुत शोधकार्य में उ.प्र.मा.शि. परिषद तथा केन्द्रीय मा.शि.प. में माध्यमिक स्तर पर अध्ययनरत छात्रों की विज्ञान विषय में रुचि का तुलनात्मक अध्ययन किया गया तथा पाया गया कि उ.प्र.मा.शि.परिषद के छात्रों की विज्ञान विषय में शैक्षिक उपलब्धि केन्द्रीय मा.शि.प. के छात्रों से अधिक है।

महात्मा बुद्ध को परंपरा से ‘तथागत’ के नाम से जाना जाता रहा है। ‘तथागत’ का अर्थ जिसने संसार में किसी तथ्य को लाने का कार्य किया है। जिस कर्म या चिंतन के द्वारा किसी तथ्य को जगत में लाया गया। कभी मनुष्य कल्पनाओं, धारणाओं या विश्वासों के बल पर किसी विचार तक पहुंचता था। सत्य क्या है यह एक समस्या बनकर रह जाती थी। खासकर साधारण मानव के लिए। तर्क को महत्त्व नहीं दिया जाता था आस्था एवं श्रद्धा का प्रभाव अधिक था। महात्मा बुद्ध इसी अवधारणा का प्रतिकार करते हैं। धारणा यदि पहले ही निर्धारित कर ली जाय तो तथ्य का महत्त्व नहीं रह जाता। यहीं से धारणा भी संदेह के घेरे में आने लगती है, जिसे दूर करने के लिए चिंतन करते हैं। चिंतन के परिणामस्वरूप इन्होंने अंतर्मुखी भाव का सृजन किया। आईने के पास यदि जाना है तो अंजान बनकर जाओ, शून्य होकर जाओ। तन से नहीं परन्तु मन से अवश्य निर्वस्त्र होकर जाओ। इसके बाद जो दिखाई दे वही सत्य है। यदि शास्त्र लेकर, धारणा लेकर सत्य तक जाना है तो बनी बनायी परम्पराएँ मिलेंगी जो उलझन पैदा करती रहेंगी। इसके लिए अंतःकरण को जगाना होगा। अंतर्मुखी होना पड़ेगा। व्यक्ति के मूल में यही एक बहुत बड़ी समस्या है जो विशाल मानव समाज को सोचने पर विवश करता है। इनके चिंतन से विविधता और विषमता दोनों के लिए प्रामाणिक तथ्य मिलते हैं। हालांकि विविधता स्वाभाविक हो सकती है लेकिन विषमता नैसर्गिक नहीं हो सकती। इसी विषमता और सामाजिक, धार्मिक विद्रूपता ने सिद्धार्थ को महात्मा बुद्ध बनने को विवश किया। इस शोध् आलेख में उक्त विचारों के आलोक में महात्मा बुद्ध के सामाजिक चिंतन के विवेचन की कोशिश की गयी है।

एक साहित्यकार कभी भी अपने समकालीन परिस्थितियों से अप्रभावित नहीं रहता है। उनके चिंतन एवं कल्पना के केन्द्र में देश-काल की स्थिति, मनुष्य एवं समाज सदैव रहते हैं। सहभोक्ता बनकर वह न सिर्फ अपने समय के तनावों, द्वन्द्वों, अंतर्विरोधों और घटनाओं के साथ तादात्म्य स्थापित करता है, वरन् अपने रचनात्मक दायित्व का निर्वहन करते हुए जीवन के यथार्थ को तलाशने एवं दिखाने की कोशिश भी करता है। अपने समय के यथार्थ को पकड़ने के लिए साहित्यकार कई माध्यमों का प्रयोग करते हैं। उनके इन प्रयोगों में मिथक सर्वथा एक सशक्त माध्यम बन कर उभरा है। मिथकों की सहायता से यथार्थ को उजागर करने का एक प्रयास उपन्यासकार नरेन्द्र कोहली जी ने भी अपने रामकथात्मक उपन्यासों के माध्यम से किया है। उन्होंनें रामायण, रामचरितमानस इत्यादि रामकथा के प्रसंगों एवं घटनाओं को वर्तमान संदर्भों से जोड़कर, यथास्थिति से अवगत कराने का एक सपफल प्रयास किया है। प्रस्तुत शोध आलेख में नरेंद्र कोहली के रामकथात्मक उपन्यासों में निहित राजनीतिक यथार्थ के स्वरूप को प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है।

जोखिम व्यवहार एवं प्रतियोगी व्यवहार के मध्य सम्बन्ध् को जानने के लिए सी0बी0एस0ई0 बोर्ड के सहशिक्षा विद्यालय के विज्ञान वर्ग के 59 विद्यार्थियों (छात्र n=32, छात्राएं n=27) को सम्मिलित किया गया व परिणाम प्राप्त हुआ कि जोखिम व्यवहार एवं प्रतियोगी व्यवहार के मध्य परिमित धनात्मक सहसम्बन्ध है।

आज की दौड़-भाग भरी जि़दगी में व्यक्ति स्वकेन्द्रित होता जा रहा है, परन्तु स्वकेन्द्रण की यह प्रवृत्ति समाज के लिये कल्याणकारी नहीं है। साहित्य का अन्तिम उद्देश्य है सत्यम् शिवम् सुन्दरम् की स्थापना। बालसाहित्य के लिए सत्यम् शिवम् सुन्दरम् का उद्देश्य अपरिहार्य है। बाल मन में लोककल्याण की भावना का बीजारोपण उसे एक श्रेष्ठ मनुष्य बनाने के लिए आवश्यक है। डॉ0 प्रभा पंत वर्तमान पीढ़ी की प्रमुख बालसाहित्यकार हैं। डॉ0 प्रभा पंत ने अपनी गद्य-पद्य रचनाओं के माध्यम से लोक-कल्याणकारी तत्त्वों की प्रतिष्ठा की है। प्रस्तुत शोधपत्र में कवयित्री के ‘मैं...’ नामक काव्यसंग्रह में लोकमंगलकारी तत्त्वों को उजागर करने का प्रयास किया गया है। कवयित्री ने संवेदनशील बनने, निर्बलों की सेवा करने, लोगों को प्रसन्नता प्रदान करने, असहायों का सहारा बनने, कलुषता तथा मनोमालिन्य मिटाने, जन-जन को शिक्षित करने के लिये तथा बाल्यकाल को तनावमुक्त करके, बच्चों का सहज एवं सर्वांगीण विकास करके हेतु साहित्य का सृजन किया है।

शुक्लोत्तर समीक्षा की कड़ी में हज़ारी प्रसाद द्विवेदी के पश्चात सबसे महत्त्वपूर्ण नाम डॉ नगेन्द्र का ही है। हिन्दी कविता की उत्तर- छायावाद से प्रस्थान कर काव्यशास्त्र में रस-सिद्धान्त का पुनराख्यान प्रस्तुत करना डॉ नगेन्द्र  की साहित्य-साधना की चरम परिणति है। पण्डितराज जगन्नाथ को छोड़ दिया जाय तो रस-सिद्धान्त का ऐसा पुनराख्यान का सर्वोत्तम प्रयास डॉ नगेन्द्र द्वारा ही किया गया। हिंदी आलोचना में स्थूल से सूक्ष्म की पैठ लगाकर 'छायावाद' को स्थापित करते हुए पाश्चात्त्य काव्यशास्त्रीय तत्त्वों में भी भारतीय तत्वों को ख़ोज निकालना हिंदी आलोचना के लिए डॉ नगेन्द्र की महत्त्वपूर्ण  देन मानी जायेगी।

नृत्य मनुष्य की एक शारीरिक, अर्थपूर्ण एवं भावपूर्ण अभिव्यक्ति है। बस्तर की जनजातीय जीवन से जुड़े विभिन्न पक्षों, मूल्यों, कर्तव्यों एवं ज्ञान को हम इन नृत्यों में समाहित पाते हैं। इस शोध का प्रमुख उद्देश्य बस्तर जिले के धुरवा जनजाति में विभिन्न अवसरों पर प्रस्तुत किए जाने वाले लोकनृत्यों का संग्रहण कर गुणात्मक एवं विवरणात्मक अध्ययन करना है। प्राथमिक आँकड़ो के संकलन हेतु भारत के छत्तीसगढ़ राज्य के बस्तर जिले के चीतापुर गांव में निवासरत धुरवा जनजाति को चुना गया है। धुरवा जनजाति में प्रचलित विभिन्न पारम्परिक लोक नृत्यों (शिकार, मेंढकी नृत्य) का वीडियों रिकार्डिग, फोटोग्रापफी और साक्षात्कार किया गया। चीतापुर ग्राम के धुरवा जनजाति में मेढ़की नृत्य, खेल नृत्य का एक प्रकार है जिसमें नर्तक जमीन पर मेंढ़क की प्रकृति के अनुसार बैठकर नृत्य करता है। धुरवा जनजाति में हास्य, उमंग, उत्साह से भरपुर शिकार (पारद) नृत्य एक प्रसिद्व लोकनृत्य है जिसमें पुरूष नर्तक ही भाग लेते हैं।

भारतीय विश्वविद्यालयों के शैक्षणिक स्तर को वैश्विक स्तर पर लाने के लिये प्राथमिक और उच्चतर प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता को सुधारना आवश्यक है  क्योंकि, प्राथमिक और प्राथमिक उच्चतर शिक्षा की गुणवत्ता उच्च शिक्षा की गुणवत्ता का आधार है। प्राथमिक शिक्षा जितनी उच्च कोटि की होगी, उतनी ही अधिक उच्च कोटि की उच्च शिक्षा होगी। गुणवत्तापूर्ण और तर्कपूर्ण शिक्षा के प्रचार और प्रसार के लिये शिक्षा समितियों, अध्यापकों और अविभावकों में कर्तव्यनिष्ठता का बोध विद्यमान होना अत्यावश्यक है। भारत में ऐसी शिक्षा प्रणाली के विकास की आवश्यकता है_ जिस के माध्यम से, व्यक्ति की विश्लेषणात्मक दृष्टि, कल्पनाशक्ति, तर्कपूर्ण विचारों इत्यादि का विकास और ‘मनस्’ का परिमार्जन सम्भव हो तथा समाज के साथ तारतम्य स्थापित होना सम्भव हो। विकसित शिक्षा प्रणाली, और नागरिकों के पारस्परिक तारतम्य से भारतीय विश्वविद्यालयों के शैक्षणिक स्तर को वैश्विक स्तर पर लाने का प्रयास किये जाने की परम आवश्यकता है।

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1. उच्च शिक्षा में सुधार हेतु ए.पी.आई.और अन्य संबंधित विषयों के परिवर्तन में कया जल्दबाजी उचित है?
 
2. भारत में समाज विज्ञान एवम मानविकी की शोध पत्रिकांए शोध के स्तर को बढाने में निम्न सामर्थ्य रखतीं हैं-
 
3. क्या आप भारतीय विश्वविद्यालयो में हो रहे शोध से संतुष्ट है?
 
4. भारतीय विश्वविद्यालयों में मानविकी एवं सामाजिक विज्ञानं के अधिकांश शोध हैं –