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Vol.8, Issue 2

Vol.8, Issue 2

SHODH SANCHAYAN

 

Vol.8, Issue.2, 15 Jul, 2017

ISSN  2249 – 9180 (Online)

Bilingual (Hindi & English)
Half Yearly

Print & Online

Dedicated to interdisciplinary Research of Humanities & Social Science

An Open Access INTERNATIONALLY INDEXED REFEREED RESEARCH JOURNAL and a complete Periodical dedicated to Humanities & Social Science Research.

मानविकी एवं समाज विज्ञान के मौलिक एवं अंतरानुशासनात्मक शोध पर  केन्द्रित (हिंदी और अंग्रेजी)

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Index/अनुक्रम

 

मोहन राकेश ने आधुनिकता बोध के धरातल पर अस्तित्ववादी चिन्तन के परिपार्श्व में अपने उपन्यास की सर्जना की है। इसका विवेचन करते हुए यह कहना अधिक उचित लगता है कि मोहन राकेश का यह सामाजिक अस्तित्व चिन्तन मूलतः व्यक्तिवादी स्तर पर अपनी गहरी छाप बनाए हुए समाज में अपने अस्तित्व के प्रति संघर्षरत मानव की एक ऐसी कथात्मक अभिव्यक्ति के रूप में उभरता है जो समाज में रहकर भी समाज से जुड़ पाने में विवशता अनुभव करता है। व्यक्तिवादी अस्तित्व चेतना बताती है कि जीवित रहना ही मनुष्य की नियति है। उसे जीवन का अर्थ चुक जाने की स्थिति में भी लाचार होकर जीना हैं क्योंकि पुरानी मान्यताऐं अर्थहीन हो चुकी है। और मनुष्य के सामने कोई ठोस विकल्प भी नही है।

अस्तित्ववादी चिन्तन की आधारभूमि पर विकसित मोहन राकेश के तीनों उपन्यास मुख्यतः नारी पुरूष के बदलतें सन्दर्भ और उनके बीच पनपते जटिल सम्बंधों की सूक्ष्म व्याख्या प्रस्तुत करते है।

Indian culture is oldest in world and well known for this kindness and ideals of thoughts, conduct and tradition. Human rights concept is absolutely new derived from democratic movements in modern Urope. Indian Constituton human rights have been incorporated. In this article indian culture is reviewed in respect of human rights. The main theme of this paper is to provide an outlook about the nourishing traits of Indian Culture which is still a powerful resource of human value that creates synergy effect for the entire humanities and three common values as Truthfulness, Peacefulness and Reverence.

चौक पूरना भारतीय संस्कृति में एक मांगलिक कार्य माना जाता है। उत्तर प्रदेश के हिन्दू परिवारों के लगभग सभी शुभ कार्यों में पूजा का विधान है, और इस पूजा में पूजास्थल पर बनायी जाने वाली वेदी में सूखे आटे के प्रयोग से भूपृष्ठ पर ज्यामितीय आकृतियाँ बनायी जाती हैं। इसे चौक कहते हैं जिस पर देवी-देवताओं और यज्ञवेदी को प्रतिष्ठित किया जाता है। वस्तुतः यह एक प्रकार की लोककला है। इसे लोककला के शब्दों में धूलिचित्र भी कहते हैं। प्रस्तुत शोध आलेख में इस कला के पारम्परिक स्वरूप एवं इसकी शास्त्रीयता की मौलिक ढंग से अन्विक्षा की गयी है।

प्रस्तुत पत्र साहित्य एवं दर्शन के सम्बन्धों को मानवतावाद के परिप्रेक्ष्य में पुनर्व्याख्या करने का सूक्ष्म प्रयास है। साहित्यिक अभिव्यक्ति का चरमोत्कर्ष न केवल साहित्य, दर्शन तथा मानवतावाद को एक दूसरे के अनुपूरक के तौर पर प्रस्तुत करता है बल्कि वे एक-दूसरे में अतिव्याप्त भी हो जाते हैं। इस विश्लेषण के अन्तर्गत यह शोधपत्र दान्ते, तुलसीदास और गालिब के उन सर्वनिष्ठ मानवीय मूल्यों पर केन्द्रित है जो स्थान और काल में भिन्न होते हुए भी विचारों से एक दूसरे को आप्लावित करते हुए दर्शन के उच्चतम बिन्दु आध्यात्म को आत्मसात भी करते हैं। इस शोधपत्र में दर्शन एवं मानवतावाद, दर्शन और साहित्य एवं मानवतावाद तथा साहित्य के इन महानायकों के वैचारिक मतैक्य की भी स्वस्थ समालोचना प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है।

पुरोहित से खलीफा तक धार्मिक पर्यावलोचन शोधपत्र में प्राचीन दुनिया के भारत, ईरान, चीन, बेबीलोन, सुमेर और मिश्र जैसे देशों की जनता में पुरोहित राजा के धार्मिक, सामाजिक, राजनैतिक योगदान का जहां अभिचित्रण सुलभ मिलता है, वहीं साम्राज्यों के जनक इतिहास के करवट लेने के कारण मध्य युगीन पश्चिमी-मध्य एशिया और भारत के इल्तुतमिश, मुहम्मद-बिन-तुगलक और फिरोज तुगलक जैसे सुल्तान बगदाद अर्चना मिश्र के खलीपफा प्रभावित दिखाई पड़ते हैं। भारतीय इतिहास के वैदिक युग से लेकर राजपूत युग तक राजपुरोहित प्रशासन का महत्व अधिकारी रहा है, वहीं शुगकालीन अयोध्या अभिलेख, समुद्रगुप्त की प्रयाग प्रशस्ति, करमदण्डाभिलेख, स्कन्दगुप्त के जूनागढ़ अभिलेख से लेकर गाहडवाल शासक जयचन्द के फैजाबाद अभिलेख आदि जैसे पुरातात्विक साक्ष्यों के आलोक में पुरोहित और ब्राह्मणों के सांस्कृतिक क्रियाकलापों का अनुशीलन किया गया है। मुगलकालीन भारत में भी पुरोहित और ब्राह्मण को समाज में गौरवपूर्ण स्थान प्राप्त था। जिस प्रकार से प्राचीन दुनिया की राज्य व्यवस्था पुरोहितों से प्रभावित थी, उसी प्रकार से मध्य युगीन पश्चिमी एशिया, उत्तरी अप्रफीका से लेकर मध्य एशिया, सिन्ध से स्पेन तक खलीपफाओं के विजय और साम्राज्य विस्तार क सम्बंध में भी प्रकाश डाला गया है। उमैय्यद वंश के प्रसिद्ध खलीफाओं में उमर द्वितीय, अल वालिद प्रथम और आनन्द से परिपूरित थे। इसी प्रकार इस शोधपत्र में अब्बासी राजवंश के अमर कला कौशल और भौतिक प्रगति का निरूपण विश्व प्रसिद्ध सामरा की खुदाई से प्राप्त पुरावशेषों के परिप्रेक्ष्य में किया गया है। इस शोधपत्र में मध्य युगीन इस्लामिक दुनिया के इन रहनुमाओं-खलीफाओं द्वारा लोकहित का ध्यान रखते हुए अवीबुसा, माकाल और अमीरूल जैसी नहरों, इमारतों, सड़कों का निर्माण बगदाद कूफा, मोसल, बसरा, फुसतेट और  काहिरा जैसे नगरों की स्थापना, मक्का, मदीना कुपफा, येरुशलम, बंसरा, दाश्मिक, त्रिपोली और सिकन्दरिया जैसे तीर्थों की परिचर्चा भी उकेरी गयी है।

Children of alcoholics (COAS) and addicts can have deep-seated psychological and emotional reactions to growing up with an alcoholic parent. In a present situation, The aim of the present study is to analyze and compare the self-efficacy, self-esteem and resilience in adolescents’ children of alcoholics (COAS) and those of children of non-alcoholics (nCOAS). Sample of the study consisted of 120 adolescents’ children of alcoholic and non-alcoholic parents. I have taken 60 adolescents’ children from alcoholic parents on the other side 60 adolescents’ children of non-alcoholic parents with same socio-economic statuses. Purposive sampling method has been used for data collection. General Self-Efficacy Scale, Rosenberg Self-Esteem Scale and Connor-Davidson Resilience Scale were used for data collection. Means, standard deviation, t-test and correlation technique were used to analyze the data.  Result revealed that there is significant difference in self-efficacy, self-esteem and resilience between the adolescents of alcoholic parents and non-alcoholic parents. Self-efficacy, self-esteem and resilience were lower in the group of children of alcoholic parents in comparison to children of non-alcoholic parents. Self-efficacy and self-esteem was positively correlated with each other. It is clear that children of alcoholics have more emotional and psychological problems than children of non-alcoholics. Through the cognitive behavioural intervention it was observed that self-efficacy, self-esteem and resilience could be enhanced among children of alcoholics.

प्राचीन दशपुर नगर (आज का मन्दसौर) का, मध्य प्रदेश के मालव अंचल में, शिवना नदी के तट पर अवस्थित होने का उल्लेख मिलता है। शिवना नदी के दोनों तटों से उत्खननों के परिणामस्वरूप प्राचीन बस्तियों के अनेकशः प्रमाण मिलते हैं। इस परिक्षेत्र से पाषाण काल से आज तक के सांस्कृतिक सातत्य का प्रमाण व्यवस्थित रूप से मिलता है। वत्सभट्टि द्वारा विरचित मन्दसौर अभिलेख से समग्र दशपुर नगर परिक्षेत्र की भौगोलिक एवं नगरीय व्यवस्था का मान होता है। परिप्रेक्ष्य का, वत्सभट्टि द्वारा रचित मन्दसौर अभिलेख के विशेष आलोक में वर्णन किया गया है।

हिन्दी साहित्य में अन्य गद्य विधाओं की भांति भारतेन्दु युग से यात्रा साहित्य का प्रारम्भ हुआ और बीसवीं सदी के अंतिम चतुर्थांश तक आते-आते इस विधा ने पर्याप्त विकास किया। विकास की इस प्रक्रिया में हिन्दी का यात्रा साहित्य अपना स्वरूप परिवर्तित करता रहा। विवेच्य विधा के इस स्वरूप परिवर्तन को वर्णित कालावधि (1975-2000 ई.) के प्रवृत्यात्मक अध्ययन के अर्न्तगत देखा जा सकता है। आठवें दशक के हिन्दी यात्रा साहित्य में लेखकों की घुमक्कड़ी प्रवृत्ति उभर कर सामने आयी है। रचनात्मक प्रौढ़ता तथा शैलीगत वैशिष्ट्य की दृष्टि से पच्चीस वर्षों का यह समय प्रस्तुत विधा की प्रवृत्यात्मक अध्ययन के लिए विशेष महत्वपूर्ण है।

हिन्दी साहित्य में अन्य गद्य विधओं की भांति ही भारतेन्दु युग से यात्रा साहित्य का प्रारम्भ हुआ और बीसवीं सदी के अंतिम चतुर्थांश तक आते-आते इस विद्या ने पर्याप्त विकास किया। इस विकास क्रम की प्रक्रिया में हिन्दी का यात्रा साहित्य अपना स्वरूप परिवर्तित करता रहा। विवेच्य विधा के इस स्वरूप परिवर्तन को वर्णित कालावधि (1975-2000 ई.) के प्रवृत्यात्मक अध्ययन के अर्न्तगत देखा जा सकता है। आठवें दशक का हिन्दी यात्रा साहित्य विधा के लेखकों की रचनात्मक प्रौढ़ता तथा शैलीगत वैशिष्ट्य उनकी रचनाओं में प्रतिबिम्बित लेखकों की घुमक्कड़ी प्रवृत्ति उभर कर सामने आयी है। पच्चीस वर्षों का यह समय प्रस्तुत विधा की प्रवृत्यात्मक अध्ययन के लिए विशेष महत्वपूर्ण है।

The impact of new media technology can be seen in all dimensions of life. It is also changing the earlier theories and concepts given in reference to various subjects. In this research paper, the researcher has tried to analyse the applicability of communication theories in reference to new media information and communication technology.

कालिदास आौर प्रसाद दोनो भारतीय साहित्य के अमूल्य ध्रोहर हैं। इनकी रचनाओं में नाट्य साहित्य विध के समस्त लक्षण एवं व्यंजना का व्याकरणिक आभास मिलता है। कालिदास ने जहां अपने नाटकों में शारीरिक सौंदर्य के साथ-साथ भावनात्मक मनोवेगों एवं हृदय के विशालता का सुरुचिपूर्ण चित्रण किया है। वहीं प्रसाद के नाटकों में भी हमें प्रेम को ध्रातल पर समर्पण, त्याग, निष्कपटता एवं निश्चछलता का प्राकट्य प्रतीत होता है। दोनों ने अपने नाटकों में नारी को प्रकृति से तुलनीय माना है। नारी हृदय की विशालता प्रकृति की विशालता के समान है। दोनों में प्रेम की अभिव्यक्ति उदत्त प्रकृति की है। इसका चरित्रा आदर्शवादी है। इस प्रकार सापेक्षिक दृष्टि से दोनों कवियों की रचनाएं समकालीन प्रवुत्तियों को समेटने के साथ ही सार्वकालिक प्रासंगिकता रखती हैं।

प्रस्तुत शोध आलेख में जे. पी. आंदोलन की प्रकृति, विस्तार एवं आंदोलन के तात्कालिक एवं दूरगामी प्रभावों का संक्षेप में गहन विवेचन विश्लेषण एवं मूल्यांकन किया गया है। शोध पत्र में यह भी रेखांकित किया गया है कि केवल शासन व्यवस्था को बदल देने से समाज का कल्याण होने वाला नहीं है क्योंकि सत्ता का चरित्र समान ही होता है। इसीलिए जे. पी. सम्पूर्ण क्रांति के माध्यम से एक ऐसे वर्ग विहीन, शोषणमुक्त समतामूलक समाज का निर्माण करना चाहते हैं जहां गरीबी, भूखमरी, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, सामाजिक-आर्थिक विषमता से निजात दिलाने वाला एक मजबूत तंत्र होगा। लेकिन सत्ता लोलुपता एवं सिद्धान्त विहीन राजनीति ने जे. पी. आंदोलन को महज सत्ता परिवर्तन का एक अल्पकालिक अनुष्ठान साबित किया। शोधपत्र में इन बिन्दुओं पर भी तथ्यात्मक प्रकाश डाला गया है।

पुरानी और नयी सदी के दो छोरों को समेटता ‘समय सरगम’ जिए हुए अनुभव की तटस्थता और सामाजिक परिवर्तन से उपजा एक अनूठा उपन्यास है। लेखिका ने बुजुर्गों की कथा के माध्यम से जीवन के अन्तिम पड़ाव पर जी रहे लोगों की उलझनों, मानसिक द्वन्द्वों, और मृत्युमय जैसे कई विषयों पर चिंतन प्रस्तुत किया है। इस शोध लेख का उद्देश्य वर्तमान में बुजुर्गो की पारिवारिक माहौल में उनकी वास्तविक स्थिति को कई प्रसंगो के माध्यम से उजागर करना और अरण्या के बहाने अपने जीवन के बचे हुए समय के सरगम को चिन्ताओं से परे हटकर उमंग के साथ सुनने और जीवन के प्रति सजग रहने की चेतना के लिए एक विनम्र प्रयास है।

रेलवे वाणिज्यिक आधार पर कार्य करने वाली एक सरकारी प्रतिष्ठान है, जिसमें सर्वाधिक कार्मिक कार्यरत है। रेलवे का यह उत्तरदायित्व है कि वह अपने कार्मिक को सन्तुष्टि प्रदान करें, जिससें उनका मनोबल ऊंचा हो तथा कार्य की उत्पादकता बढ़ सके। इस दिशा में भारतीय रेलवे द्वारा नित्य-प्रतिदिन नूतन प्रयोग कियें जाते रहें हैं। कर्मियों के कल्याण के लिए अच्छी सुविधयें, अनुकूल कार्य की दशायें एवं आनुषंगिक लाभ, व्यक्ति में कार्य के प्रति प्रतिबद्धता पैदा करता है और इस प्रतिबद्धता से व्यक्ति में कार्य सन्तुष्टि पायी जाती है। सामान्यतः कार्य-सन्तुष्टि पर कार्य की संरचना का प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है। रोजगार की संरचना तनाव या दबाव को उत्पन्न करती है, जो कार्मिक की सन्तुष्टि को कई स्तरों से प्रभावित कर सकती है।

Retail store management has become important not only due to increase in consumer demand but also due to change towards cosmopolitan structure of population in major cities leading to diversity in consumer choices. One of the issues is to understand consumer behavior from the perspective of the days the customers choose to buy their products for special occasions such as marriages, religious functions, etc. This paper analyzes the consumer’s preference of days of the week for special occasion purchases, such as marriages, religious functions, etc. and statistically tests the relationship between consumer’s region of origin (North, South, East, and West) and their preference for days of the week. It has been found through analysis that while there is significant relationship between age, gender, marital status, annual income and region of origin, there is no significant relation between preference and education. The paper concludes that there is a predominance of consumer’s preference for Wednesday for special occasion purchases.

प्रस्तुत लेख ‘‘उत्तर भारत में मध्यकालीन कृष्ण संबंधी चित्रों का समीक्षत्मक अध्ययन (राजस्थान के विशेष संदर्भ में)’’ पर आधारित है। यह लेख राजस्थान व उनकी उप शैलियों के उन कृष्ण चित्रों पर वर्णित किया गया है जो कि मध्य कालीन चित्रकारों द्वारा चित्रित हैं। इन कृष्ण चित्रों का चित्रगत तत्वों (रेखागत आंकलन, रूपगत आंकलन, रंगगत आंकलन, तानगत आंकलन, पोतगत आंकलन एवं अंतराल) के आधार पर समीक्षात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया है, जिससे इन चित्रों की विशेषताएँ उजागर हुई हैं। इस लेख से राजस्थान के मध्यकालीन कृष्ण संबंधी निर्मित चित्रों की विशेषताएँ समाज के समक्ष प्रस्तुत होगीं।

एक सजग और संवेदनशील उपन्यासकार के रूप में नरेन्द्र कोहली ने अपने पौराणिक उपन्यासों के माध्यम से प्राचीन समय में नारी की स्थिति का सजीव, प्रमाणिक एंव कलात्मक चित्रण प्रस्तुत किया है। इन्होंनें पौराणिक कथा के माध्यम से अपने समकालीन आधुनिक नारी-जीवन के विभिन्न पहलुओं को भी सफलतापूर्वक उजागर करने की कोशिश की है। रामकथा पर आधृत अपने उपन्यास ‘अभ्युदय’ में एक ओर जहाँ उन्होंनें अहिल्या, सीता, कौशल्या आदि पौराणिक नारी पात्रों के माध्यम से अपने समकालीन पुरूष-प्रधान समाज में नारी के ऊपर हो रहे शोषण को प्रदर्शित किया है, वहीं दूसरी ओर पुरूष प्रधान समाज द्वारा हो रहे स्त्रियों के प्रति अनैतिक बर्ताव का विरोध सीता के माध्यम से करवाया है। कोहली जी के रामकथात्मक उपन्यासों में आधुनिक नारी की स्त्री-स्वातंत्र्य को लेकर उठते विद्रोहपूर्ण स्वर की अभिलाषाएँ द्रष्टव्‍य हुई हैं। प्रस्तुत शोध आलेख में नरेन्द्र कोहली के उपन्यासों में अभिव्यक्त नारी की दशा-दिशा का विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है।

The study of isms (mainly naturalism, idealism, pragmatism and realism) gives a sense of ‘meaning’ to the educational practitioner for his work and its place in the general scheme of life. It enables him to see clearly the relationship between his day-to-day, so called the routine work and the goals of an individual, social and national life. He will not feel that he is lost in the wilderness counting the trees without having an idea of the horizons. It would help him to adjust himself to his work to fit in a square peg and if necessary to try to change in his own possible ways the status quo. This paper tells how teaching of isms gives a purpose and a direction to life which he would be able to infuse in children or teachers as the case may be.

समाज केवल मनुष्य तक ही सीमित नहीं है, तथापि वह समस्त प्राणी-वर्ग में प्रत्यक्ष रूप से दृष्टिगोचर होता है। जीव-जगत में मनुष्य सर्वाधिक बुद्धि-सम्पन्न प्राणी है। कालान्तर में मनुष्य ने समाज के विश्लेषण की आवश्यकता का अनुभव किया और समाज के विषय में जनसाधारण का ज्ञान प्रखर करने के लिए समाज को शास्त्र के रूप में स्वीकार कर लिया। जैसे-जैसे मनुष्य-वसासतों में वृद्धि होती गई, वैसे-वैसे समाज की जटिलताएँ बढ़ती गई। मनुष्य का स्वार्थ परस्पर टकराने लगा। परिणामस्वरूप समाज की विश्रृंखलाएँ भी प्रकट होने लगीं। समाज के अन्दर निर्मित वर्गो के परस्पर विरोधी हित वैमनस्य की सृष्टि करने लगे। यहीं से संघर्ष का इतिहास प्रारम्भ होता है। मानवीय स्वार्थों की आधारशिला पर ही समाज की संरचना प्रारम्भ हुई। इसी कारण मनुष्य ने समाज के अंतर्गत ऐसे मूल्यों की स्थापना की जिससे उनकी स्वार्थ-सिद्धि होती थी। ईश्वर प्रदत्त शाश्वत मूल्यों की स्थापना के लिए समाज की रचना नहीं की गई, बल्कि अनेक नियमों के द्वारा व्यक्ति को अनेक कर्तव्यों में बाँधा गया जिससे मनुष्य परस्पर हित-साधना में रत हो सकता है।

In today’s era new changes are being made in the field of education and these changes are aiming to enhance the quality of education. In one hand the privatization of education and the spread of technology have brought revolutionary changes in the field of education however on the other hand human values and ethics have declined. Westernization has impacted the complete existence and outlook of Indian society whereas the progressive ideology of Mahamana Malaviya appears to be very meaningful and useful to hold the roots of Indian society. The ideology of Mahamana Malaviya emphasizes the need to maintain the ancient cultural traditions of India along with the modern changes.

प्रस्तुत लेख का उद्देश्य मीडियाकर्मियों की पृष्ठभूमि, व्यक्‍तित्‍व एवं व्यवसाय में परस्पर सबंध का अध्ययन करना है। मीडिया एक प्रभावशाली यन्त्र है, इसके माध्यम से समाज में परिवर्तन लाना सहज है। मीडिया का प्रभाव जन-जीवन पर सरलता से पड़ता है, बिना इसकी सहायता के लोगों के स्वभाव एवं मनोवृत्तियों को बदलना अत्यंत कठिन है। मीडिया लक्ष्य प्रतीकों का अविष्कार करता है जो व्यवहार में परिवर्तन का कारण बनता है।

प्रस्तुत लेख में मीडिया संस्थानों के अनेक पहलुओं को उजागर करने का प्रयास किया गया है, यथा - मीडियाकर्मियों की सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षणिक एवं आर्थिक पृष्ठभूमि तथा व्यवसायिक गतिविधियों के मध्य सबंध, मीडियाकर्मियों से संम्‍बंधित विभिन्न संस्थानों में भिन्न वर्गों की भागीदारी एवं वर्चस्वता तथा लैंगिक असमानता के असर का आकलन तथा परीक्षण। निष्पक्ष खबरों के निर्माण के लिए यह आवश्यक है कि खबरों के निर्माण में जो लोग शामिल हैं उनकी सामाजिक पृष्ठभूमि का अध्ययन किया जाये। सामाजिकता के निर्धारण के पैमाने में सहयोगी तत्व हैं संस्कृति, शिक्षा और पूँजी, अतः मीडियाकर्मियों की पृष्ठभूमि में इन तत्वों के समावेश का वातावरण क्या और कैसा रहा है, ये जानना अति आवश्यक है। मीडिया की संस्कृति मीडिया चालक की संस्कृति की परिणति है, इस सत्यता को उभारने का प्रयत्न इस लेख के माध्यम से किया गया है।

समाज में ज्योतिष का अध्ययन सर्वदा से बहुत से लोगों के लिए रुचि का विषय रहा है। ज्योतिष की परंपरा इसे कार्य-कारण नियमों की कसौटी पर कसकर एक विज्ञान समान विधा सिद्ध करती रही है। कार्यकाल के सिद्धान्त में विश्वास करने वाले राजयोग के पीछे प्रारब्ध की भूमिका को स्वीकारते हैं। काल की गति किसी मनुष्य के नियंत्रण में नहीं है किंतु कालचक्र में प्रारब्ध फलीभूत होकर व्यक्ति को यशस्वी बना देता है। उच्च पद की आकांक्षा का फलीभूत होना प्रायः नियति पर आश्रित दिखायी देता है। इसलिए राजनेतागण ज्योतिर्विज्ञान में अधिक रुचि दिखाई देते प्रतीत होते हैं। परंतु शोध आलेख उक्त के आलोक में प्रधानमंत्रियों की कुंडली के आधार पर उनकी सफलता में प्रारब्ध और कालचक्र की भूमिका का गवेषणात्मक अध्ययन प्रस्तुत करता है।

पुस्‍तक समीक्षा

पुस्‍तक समीक्षा

Corporate Social Responsibility contribution by the Indian corporations have always been eyed upon very frequently and more frequently after the mandate in 2013 which asks the companies at least two percent from their net profit in the last three years. There is less knowledge about the consumer’s awareness of Corporate Social Responsibility and their perception for those who are responsible corporation. The cosmetic industry usually involves in unethical testing and various other unethical activities. The purpose of this is to study the attitude, opinion and how much do they get affected by the Corporate Social activities. The study will be done using primary data and consumers will be surveyed through a questionnaire which will have demographic, attitude and opinion variables. The results will be analyzed and interpreted accordingly.

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2. भारत में समाज विज्ञान एवम मानविकी की शोध पत्रिकांए शोध के स्तर को बढाने में निम्न सामर्थ्य रखतीं हैं-
 
3. क्या आप भारतीय विश्वविद्यालयो में हो रहे शोध से संतुष्ट है?
 
4. भारतीय विश्वविद्यालयों में मानविकी एवं सामाजिक विज्ञानं के अधिकांश शोध हैं –